Gay sex story Hindi – सुशील और चरणदास 1

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एक लड़का है सुशील, बिलकुल सीधी सादा, भगवान् में बहुत विश्वास रखने वाला । उसकी उम्र १८ थी ।

सुशील ज्यादा टाइम चुप ही रहता था। उसका कद लगभग 5 फुट 8 इंच था, रंग फेयर था, बाल काफी लंबे थे, चेहरा गोल था। उसकी छाती चौड़ी थी, कमर लगभग 31-32 इंच, चूतड़ गोल और बड़े थे, यही कोई 37 इंच।
उसके पापा सरकारी दफ़्तर में काम करते थे। उनका हाल ही में निधन हुआ था। नये शहर में आकर सुशील की मम्मी ने  एक स्कूल में टीचर की जोब ले ली । सुशील का कोई भाई नहीं था और उसकी बड़ी बहन की शादी 6 साल पहले हो गयी थी । नये शहर में आकर उनका घर छोटी सी कॉलोनी में था जो के शहर से थोड़ी दूर था। रोज़ सुबह सुशील की मम्मी स्कूल जाती और  4 बजे वापस आती ।
उनके घर के पास ही एक छोटा सा मंदिर था। मंदिर में एक पुजारी था जिसका नाम चरणदास था, यही कोई 36 साल का। देखने में गोरा और बॉडी भी मस्कुलर, हाईट 5 फुट 9 इंच। सूरत भी ठीक ठीक था। बाल बहुत छोटे छोटे थे। मंदिर में उसके अलावा और कोई ना
था। मंदिर में ही बिलकुल पीछे उसका कमरा था। मंदिर के मुख्य द्वार के अलावा चरणदास के कमरे से भी एक दरवाज़ा कॉलोनी की पिछली गली में जाता था। वो गली हमेशा सुनसान ही रहता था क्योंकि उस गली में अभी कोई घर नहीं था। नये शहर में आकर, सुशील की मम्मी ने उसे बताया कि पास में एक मंदिर है, उसे पूजा करनी हो तो वहां चले जाया करे। सुशील बहुत धार्मिक था। पूजा पाठ में बहुत विश्वास था उसका। रोज़ सुबह 5 बजे उठ कर वो मंदिर जाने लगा।
चरणदास को किसी ने बताया था एक पास में ही कोई नयी फ़मिली आई है । सुशील पहले दिन मंदिर गया। सुबह 5 बजे मंदिर में और कोई ना था। सिर्फ चरणदास था।  सुशील पूजा करने के बाद चरणदास के पास आया ।उसने चरणदास के पैर छुए.
चरणदास : जीते रहो पुत्र। ।तुम यहाँ नए आए हो ना?

सुशील: जी पुजारी जी

चरणदास : पुत्र।मुझे चरणदास कहो. तुम्हारा नाम क्या है?

सुशील: जी,सुशील

चरणदास : तुम्हारे माथे की लकीरो ने मुझे बता दिया है कि तुम पर क्या दुख आया है।लेकिन पुत्र भगवान के आगे किसकी चलती है!
सुशील: चरणदास जी।मेरा ईश्वर में अटूट विश्वास है।लेकिन फिर भी उसने मुझसे मेरा पिता छीन लिया।

सुशील की आँखों में आंसू आ गये.

चरणदास : पुत्र।ईश्वर ने जिसकी जितनी लिखी है,वह उतना ही जीता है।।इसमें हम तुम कुछ नहीं कर सकते।उसकी मरज़ी के आगे हमारी नहीं चल सकती।क्योंकि वो सर्वोच्च है।इसलिये उसके निर्णय को स्वीकार करने में ही समझदारी है।

सुशील आंसू पोंछ कर बोला

सुशील: मुझे हर पल उनकी याद आती है।ऐसा लगता है जैसे वो यहीं कहीं हैं।

चरणदास : पुत्र।तुम जैसा धार्मिक और ईश्वर में विश्वास रखने वालों का ख्याल ईश्वर खुद रखता है।कभी कभी वो इम्तेहान भी लेता है।

सुशील: चरणदास जी।जब मैं अकेला होता हूँ।तो मुझे डर सा लगता है।।पता नहीं क्यूँ

चरणदास : तुम्हारे घर में और कोई नहीं है?

सुशील: हैं। मम्मी ।लेकिन सुबह सुबह ही मम्मी स्कूल चली जाती हैं।।फिर मम्मी 4 बजे आती हैं। इस दौरान मैं अकेला रहता हूँ और मुझे बहुत डर सा लगता है।ऐसा क्यूँ है चरणदास जी ?

चरणदास : पुत्र।तुम्हारे पिता के स्वर्गवास के बाद तुमने हवन तो करवाया था ना?
सुशील: नहीं।कैसा हवन चरणदास जी?

चरणदास : तुम्हारे पिता की आत्मा की शांति के लिये यह बहुत आवश्यक होता है।

सुशील: हमें किसी ने बताया नहीं चरणदास जी।

चरणदास : यदि तुम्हारे पिता की आत्मा को शांति नहीं मिलेगी तो वो तुम्हारे आस पास भटकती रहेगी। और इसीलिए तुम्हें अकेले में डर लगता है।

सुशील: चरणदास जी।आप ईश्वर के बहुत पास हैं। कृपया आप कुछ कीजिये जिससे मेरे पिता की आत्मा को शांति मिले.
सुशील ने चरणदास के पैर पकड़ लिये और अपना सिर उसके पैरों में झुका दिया।
चरणदास ने सोचा यह तो अकेला है और भोला भी ।इसके साथ कुछ करने का स्कोप है।उसने सुशील के सिर पे हाथ रखा।

चरणदास : पुत्र।यदि जैसा मैं कहूँ तुम वैसा करो तो तुम्हारे पिता की आत्मा को शांति अवश्य मिलेगी।

सुशील ने सिर उठाया और हाथ जोड़ते हुए कहा

सुशील: चरणदास जी,आप जैसा भी कहेंगे मैं वैसा करूँगा।आप बताइए क्या करना होगा।
चरणदास : पुत्र।हवन करना होगा।हवन कुछ दिन तक रोज़ करना होगा।लेकिन इस हवन में केवल स्वर्गवासी की संतान और पुजारी ही भाग ले सकते हैं।और किसी तीसरे को खबर भी नहीं होनी चाहिये।अगर हवन शुरु होने के पश्चात किसी को खबर हो गई तो स्वर्गवासी की आत्मा को शांति कभी नहीं मिलेगी।

सुशील: चरणदास जी।आप ही हमारे गुरु हैं।आप जैसा कहेंगे हम वैसा ही करेंगे। आज्ञा दीजिये कब से शुरु करना है और क्या क्या सामग्री चाहिए

चरणदास : इस हवन के लिये सारी सामग्री शुद्ध हाथों में ही रहनी चाहिये। अत: सारी सामग्री का प्रबंध मैं खुद ही करूँगा।तुम सिर्फ एक नारियल और तुलसी लेते आना

सुशील: तो चरणदास जी,शुरु कबसे करना है।

चरणदास : क्योंकि इस हवन में केवल स्वर्गवासी की संतान और चरणदास ही होते हैं इसलिये यह हवन उस समय होगा जब कोई विघ्न ना करे।और हवन पवित्र स्थान पर होता है।यहाँ तो कोई भी विघ्न डाल सकता है।इसलिये हम हवन इसी मंदिर के पीछे मेरे कक्ष में करेंगे।इस तरह स्थान भी पवित्र रहेगा और और कोई विघ्न भी नहीं डालेगा।

सुशील: चरणदास जी।जैसा आप कहें।किस समय करना है?
चरणदास : दोपहर 12:30 बजे से लेकर 4 बजे तक मंदिर बंद रहता है।सो इस समय में ही हवन शांति पूर्वक हो सकता है।तुम आज 12:45 बजे आ जाना।नारियल और तुलसी लेके।लेकिन सामने का द्वार बंद होगा।आओ मैं तुम्हें एक दूसरा द्वार दिखता हूँ जो कि मैं अपने प्रिय भक्तों को ही दिखाता हूँ।

चरणदास उठा और सुशील भी उसके पीछे पीछे चल दिया ।उसने सुशील को अपने कमरे में से एक दरवाज़ा दिखया जो कि एक सुनसान गली में निकलता था।उसने गली में ले जाकर सुशील को आने का पूरा रास्ता समझा दिया।

चरणदास : पुत्र तुम रास्ता तो समझ गए ना।

सुशील: जी चरणदास जी।

चरणदास : यह याद रखना की यह हवन गुप्त रहना चाहिये।सबसे।वरना तुम्हारे पिता की आत्मा को शांति कभी ना मिल पायेगी ।

सुशील: चरणदास जी।आप मेरे गुरु हैं।आप जैसा कहेंगे, मैं वैसा ही करूँगा।मैं ठीक 12:45 बजे आ जाऊंगा
ठीक 12:45 पर सुशील चरणदास के बताये हुए रास्ते से उसके कमरे के दरवाज़े पे गया और खटखटाया ।

चरणदास : आओ पुत्र।किसी को खबर नो नहीं हुई।

सुशील: नहीं चरणदास जी। जो रास्ता अपने बताया था मैं उसी रास्ते से आया हूँ।किसी ने नहीं देखा।

चरणदास ने दरवाज़ा बंद किया और सुशील को एक सफ़ेद लुंगी दे कर उसे पहनने को कहा.सुशील ने पेंट उतार कर लुंगी पहन ली.

चरणदास : चलो फिर हवन आरम्भ करें

चरणदास का कमरा ज्यादा बड़ा ना था।उसमें एक पलंग था।बड़ा शीशा था।कमरे में सिर्फ एक 40 वाट का बल्ब ही जल रहा था।चरणदास ने हवन के लिये आग जलायी और सामग्री लेके दोनो आग के पास बैठ गये।

चरणदास मन्त्र बोलने लगा।
चरणदास : यह पान का पत्ता दोनो हाथों में लो।

सुशील और चरणदास साथ साथ बैठे थे।दोनो चौकड़ी मार के बैठे थे।दोनो की टांगें एक दूसरे को टच कर रही था।

सुशील ने दोनो हाथ आगे कर के पान का पत्ता ले लिया।चरणदास ने फिर उस पत्ते में थोड़े चावल डाले।फिर थोड़ी चीनी ।फिर थोड़ा दूध।।फिर उसने सुशील से कहा।

चरणदास : पुत्र।अब तुम अपने हाथ मेरे हाथ में रखो।मैं मन्त्र पढूंगा और तुम अपने पिता का ध्यान करना।

सुशील ने अपने हाथ चरणदास के हाथों में रख दिये।यह उनका पहला स्किन टू स्किन कांटेक्ट था।

चरणदास : जो मैं कहूँ मेरे पीछे पीछे बोलना

सुशील: जी चरणदास जी

सुशील के हाथ चरणदास के हाथ में थे

चरणदास : मैं अपने पिता से बहुत प्रेम करता हूँ

सुशील: मैं अपने पिता से बहुत प्रेम करता हूँ

चरणदास : अब पान का पत्ता मेरे साथ अग्नि में डाल दो

दोनो ने हाथ में हाथ लेके पान का पत्ता आग में डाल दिया
चरणदास : अब मैं तुम्हारे चरन धोऊंगा ।अपने चरन यहाँ साइड में करो।

सुशील ने अपने पैर साइड में किये।चरणदास ने एक गिलास में से थोड़ा पानी हाथ में भरा और सुशील के पैरों को अपने हाथों से धोने लगा।

चरणदास : तुम अपने पिता का ध्यान करो।

चरणदास मन्त्र पढ़ने लगा।सुशील आँखें बंद करके पिता का ध्यान करने लगा।

सुशील इस वक़्त टांगें ऊपर की तरफ़ मोड़ के बैठा था।

चरणदास ने उसके पैर थोड़े से उठाये और हाथों में लेकर पर धोने लगा।

टांग उठने से सुशील की लुंगी के अंदर का नज़रा दिखने लगा।उसकी जांघें दिख रही थी और लुंगी के अंदर के अँधेरे में हलकी हलकी उसकी सफ़ेद अंडरवियर भी दिख रही थी ।लेकिन सुशील की आँखें बंद थी ।
चरणदास के मुँह में पानी आ रहा था।लेकिन वो इसका रेप करने से डरता था।सो उसने सोचा लड़का गरम किया जाये। पैर धोने के बाद कुछ देर उसने मंत्र पढ़े। चरणदास : पुत्र।आज इतना ही काफी है।असली पूजा कल से शुरु होगी।तभी तुम्हारे पिता की आत्मा को शांति मिलेगी।अब तुम कल आना।

सुशील: जो आज्ञा चरणदास जी।

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