हिंदी समलैंगिक चुदाई कहानी – स्टाकहोम सिंड्रोम – २


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हिंदी समलैंगिक चुदाई कहानी

वैसे उसे वहां कोइ देखने वाला नहीं था, सिवाए सुकेश और रहट चलने वाले हलवाहे के. कुछ देर में मयंक की झिझक भी निकल गयी. और हौज़ में घुस कर नहाने लगा। इतना ठंडा मस्त पानी सिर्फ पहाड़ी झरनों में मिलता था। नहाते नहाते उसकी नज़र सुकेश पर गयी। वो उसे गौर से देख रहा था। कुछ देर तक मयंक ठन्डे पानी का आनंद लेता नहाता रहा, फिर हौज़ से बहार निकल आया। सुकेश ने उसे तौलिया थम दिया और खुद कपड़े उतार कर हौज़ में घुस गया। अब मयंक ने सुकेश को देखा- हट्टा कट्टा, गेंहुए रंग का शरीर, लम्बा कद, छाती और जांघों पर बाल।

नहाने के बाद दोनों वापस आ गए। सुकेश की भाभी ने दोनों को खाना खिलाया। खाना खाने के बाद मयंक वापस उसी झोंपड़े में चला गया और अपने बारे में सोचने लगा- अब ये लोग उसका क्या करेंगे? उसके बाप से कितनी फिरौती मांगेंगे? अगर उन्होंने फिरौती देने से मना कर दिया तो? इसी उधेड़बुन में पड़ा था की सुकेश आ गया।

“मयंक भैय्या आओ।”
अब मयंक और डर गया। उसे कहा ले जाने वाले थे? कहीं उन्हें फिरौती देने से इंकार तो नहीं कर दिया गया? अब क्या वो उसे मारने वाले थे?
बेचारे का डर के मारे गला सूख गया, चेहरे पर सन्नाटा छा गया। वो सुकेश की शकल देखने लगा।
“अरे क्या हुआ भैय्या? तुम्हे किसी ने कुछ कह दिया क्या?” उसने मयंक से पूछा।
” नहीं… लेकिन कहाँ आने के लिए कह रहे हो?”
“अरे तुम्हे अपना गाँव दिखाने के लिए ले जा रहे हैं। वैसे भी सारा सारा दिन बैठे हुए उबोगे।” सुकेश ने आराम से जवाब दिया। “लेकिन तुम इतना डरे हुए क्यूँ हो?”
“कुछ नहीं, बस ऐसे ही।” मयंक ने मायूस लहजे में जवाब दिया और उठ कर सुकेश के साथ चल दिया।


सुकेश मयंक को गाँव देहात दिखता हुआ, खेतों, झुरमुटो, हरे भरे बागों, तालाबो, छोटी छोटी नालियों के बीच से न जाने का लिए जा रहा था।
कुछ देर बाद हिम्मत करके मयंक ने पूछ ही लिया : “तुम मुझे कहाँ लेकर जा रहे हो? सच बताओ?”
सुकेश चौंक गया। उसे लगा शायद मयंक ने भांप लिया है। ” अरे …. बस यूँ ही। हमें लगा की तुम्हे यहाँ शोर शराबे में अच्छा नहीं लगेगा तो हम तुम्हे किसी शांत जगह ले जा रहे हैं। करीब दस मिनट और चलने के बाद वो एक बाग़ से घिरे एक झोंपड़े के सामने आ गए।
उस झोंपड़े के इर्द गिर्द सिर्फ आम के घने बाग़ थे। मतलब की उस झोंपड़े से बाग़ के बहार नहीं देखा जा सकता था, और न ही कोइ बाग़ के बहार से उस झोंपड़े को देख सकता था। शायद वो चौकीदार या माली के लिए बनायी गयी थी। मयंक को यहाँ इसलिए लाया गया था क्यूँ ये जगह सबसे अलग थलग थी। गाँव में रहता तो शायद उसकी खबर कहीं न कहीं से पुलिस को लग जाती। इस झोंपड़े उसे कोइ नहीं देख सकता था। और जहाँ तक उसकी बात है, उसे तो पता ही नहीं था की वो कहाँ है।
“यह हिंदी समलैंगिक चुदाई कहानी इंडियन गे साइट डॉट कॉम के लिए विशेष रूप से है”
मयंक अभी भी डरा हुआ था। सुकेश ने झोंपड़ी कर ताला खोला और मयंक को अन्दर ले गया। ये झोंपड़ी पहले वाली से थोड़ी बड़ी थी। इसमें दो चारपाईयाँ पड़ी थी। थोड़ा बहुत चलने फिरने के लिए जगह भी थी।

“ये जगह कैसी है भैय्या?” सुकेश ने मयंक से पूछा। बेचारे ने डर में हाँ में सर हिल दिया। “अच्छा भैया, तुम आराम करो मैं अभी आता हूँ।” सुकेश वहां से निकल गया और गाँव की में विलीन हो गया। बेचारा मयंक फिर से उधेड़बुन में डूब गया। झोंपड़ी में बैठा बैठा ऊब रहा था, टहलने के लिए बाहर आ गया। बाग़ की घनी हिरयाली में उसे बहार का कुछ भी नहीं दिख रहा था। इर्द गिर्द कुछ आम के पेड़ों की शाखें झुक कर नीचे आ गयी थी, और पूरा प्राकृतिक पर्दा बन गया था। मयंक घूमता हुआ बैग के सिरे पर आ गया। दूर दूर तक नज़र घुमाने पर भी उसे न के आदमी दिखाई दिया न आदमी की ज़ात और न ही उसे रास्ता मालूम था। उसने भागने का विचार फिर त्याग दिया।

सूरज अब ठीक सर पर था। सुकेश को गए दो घंटे से ऊपर हो गए थे, लेकिन उसका कोइ अता पता नहीं था। वो लौट कर झोंपड़े में वापस आ गया और एक ठंडी सी आह भर कर चारपायी पर बैठ गया। थोड़ी देर पर पत्तियों पर सरसराहट हुई तो देखा की सुकेश वापस आ रहा था। उसके हाथ में एक गठरी थी।

“माफ़ करना भैय्या, थोड़ी देर हो गयी। मैं भोजन लेने गया हुआ था। उसने फ़ौरन गठरी खोली, कपड़ा बिछाया और केले के पत्तों पर खाना परोस दिया। दोनों ने पेट भर कर रोटी खायी फिर सुकेश मयंक को बाग़ के सिरे पर एक नाली पर ले गया। “भैय्या इसमें ताज़ा पानी आता है। कभी प्यास लगे या फिर पानी की ज़रुरत पड़े तो यहीं से ले लेना।

पानी पीकर मयंक फिर से झोंपड़े में आ गया और मायूस होकर बैठ गया। सुकेश मयंक के दिल को ताड़ गया। उसके बगल आकर बैठ गया।
“क्या सोच रहे हो भैय्या? ज्यादा दुखी मत हो, कुछ दिन बाद तुम्हे घर छोड़ आयेंगे। कुछ दिन हमारे भी मेहमान बन कर रहो”
“मुझे मालूम है। मैंने कल रेडियो पर सब सुन लिया है।”
अब सुकेश संजीदा हो गया। अब वो क्या बोले मयंक से।
फिर मयंक खुद ही बोला “कितने पैसे मांगे हैं?”
“अगर पैसे नहीं मिले तो मुझे मार डालोगे?”
मयंक सुकेश की तरफ देख रहा था। सुकेश की हिम्मत नहीं हो रही थी की वो उससे नज़र मिलाये।
“अरे नहीं मयंक भैय्या… कैसी बातें कर रहे हो। तुम तो मेरे छोटे भाई जैसे हो। कुछ दिनों बाद तुम्हे छोड़ आयेंगे।

सुकेश की बातों का उसपर कोइ असर नहीं हुआ। वो बेचारा सारी दोपहर, शाम सर लटकाए घूमता रहा, टहलता रहा। सुकेश तब से वही था। मयंक पर नज़र रखने की ज़िम्मेदारी अब उसकी थी, उसे उसके साथ ही उस झोंपड़े में रहना था। थक हारकर मयंक झोंपड़े में पड़ी खाट पर आकर बैठ गया। सुकेश पहले से वहां बैठा हुआ था। सुकेश उसके पास आकर बैठ गया। अपनी बांह उसके कन्धों पर रखता हुआ बोला “क्यूँ परेशान हो रहे हो भैया, चिंता मत करो, कुछ दिनों बाद तुम्हे घर छोड़ आएंगे।”
मयंक ने कोइ जवाब न दिया और अपने हाथों से सर थामे बैठा रहा। सुकेश भी उसी तरह उसे कंधो पर अपनी बांह डाले बैठा रहा। वो भी कुछ ज्यादा बोल तो सकता नहीं था। ऐसे में कोइ बोलता भी तो क्या?
फिर भी उसने मयंक का ध्यान बटाना जारी रखा। “घर की याद आ रही है?”

मयंक ने ‘न’ में सर हिला दिया। उसे घर से बाहर रहने की आदत थी। वो वास्तव में अपनी जान को लेकर परेशान था। उसे बहुत अच्छे से मालूम था की नक्सली किसी को भी नहीं छोड़ते।
सुकेश ने बात करना जारी रक्खा।
“भूख तो नहीं लगी?”
“तबियत अगर ख़राब हो तो बताना।”
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लेकिन मयंक उसी तरह दुखी सर लटकाए बैठा हुआ था। सुकेश उसके बगल बैठा उसका जी बहलाता रहा। लेकिन फिर वो हार गया।
“आओ तुम्हे गाँव दिखा लायें।” सुकेश ने उसका ध्यान भंग करने के लिए कहा।
“चलो।” मयंक ने बुझे हुए स्वर में कहा। दोनों उठ कर चल दिए। अब तक शाम घिर आई थी। सुकेश मयंक के कंधे पर हाथ डाले उसे देहात घुमाता रहा।
अब तक मयंक का थोड़ा सा मूड ठीक हो चला था, सुकेश के साथ हंसी मज़ाक कर रहा था।
“दिन में कितनी बार हिलाते हो?”
सुकेश ने उससे पूछा . मयंक मुस्कुराकर बोल “कुछ पक्का नहीं … जब मूड होता है तब कर लेता हूँ। और तुम?’
“हा हा हा… हफ्ते में दो तीन बार तो हो ही जाता है। कभी ब्लू फिल्म देखी है?”
“हाँ नेट से डाउनलोड करके देखी है।”
“यहाँ पर इन्टरनेट तो है नहीं, हम लोग डी वी डी पर ही देख लेते हैं।”
दोनों इसी तरह मज़ाक करते, टहलते हुए एक गाँव में पहुँच गए। थोड़ा चलने पर दोनों एक अधपक्के मकान तक पहुँच गए। “आओ भोजन कर लें ” सुकेश ने उस घर की कुण्डी खटखटायी। एक ग्रामीण महिला ने दरवाज़ा खोला और सुकेश को देखकर मुस्कुरायी।
“सुकेश भैया आयें हैं” उसने अपने परिवार वालों को सूचित किया।
वो उन दोनों को अन्दर ले गयी और आँगन में एक चारपाई पर बैठा दिया।
उस महिला का पति भी आकर बैठ गया। सुकेश से नमस्ते दुआ के बाद बोला “यही हैं मयंक भैया?”
“हाँ।”
“मयंक भय्या, आपको अगर कोइ तकलीफ हो हमें क्षमा कीजियेगा। हम गरीब लोग हैं।”
मयंक हलके से मुस्कुरा दिया। उन दोनों ने लालटेन की रौशनी में खाना खाया।
खाना खाकर जब उठे तो वह व्यक्ति सुकेश को लेकर बहार चला गया।
मयंक फिर से डर गया- कही ये उसे मारने तो नहीं वाले? उसने बहुत दिनों से समाचार भी नहीं सुना था। भगवान जाने क्या हो रहा था।
मयंक अकेला आँगन में बैठा रहा। कुछ देर बाद वो दोनों आ गए और सुकेश मयंक को लेकर वापस चल दिया। जाते जाते उस ग्रामीण ने सुकेश को लालटेन और एक मछर भागने की अगरबत्ती थमा दी। अब तक रात हो चुकी थी। दोनों लालटेन की रौशनी में वापस उस बाग़ की तरफ चल दिए। मयंक पहले की तरह सहमा हुआ सुकेश के साथ चल रहा था। सिर्फ सुकेश रस्ते भर बोले जा रहा था। मयंक का आधा ध्यान रस्ते पर था। गाँव के कच्चे, टेढ़े मेढ़े रास्तों का वो आदि नहीं था, ऊपर से अँधेरा। थोड़ी देर बाद दोनों उसी झोंपड़ी में पहुच गए।

किसी ने वहां पहले से ही गद्दे और तकिये रखवा दिए थे।

“आह… चलो मयंक भैय्या, सोने की तैय्यारी करें। आप थक गए होंगे।” कहते हुए सुकेश चारपाइयों पर गद्दे और तकिये लगाने लगा। मयंक भी चुप चाप उसका साथ देने लगा।
फिर सुकेश ने झोंपड़े का दरवाज़ा बंद करके कुण्डी चढ़ा दी, मछर भागने की अगरबत्ती जलाई और लालटेन बुझा दी।
मयंक बेचारा घबराया हुआ, बिस्तर पर पड़ा था। मन में बुरे बुरे खयाल आ रहे थे … ईश्वर न जाने क्यूँ माँ -बाप के बुरे कामों की सज़ा बच्चों को देता है … कहीं ये रात में ही उसे मार दे तो …? उसका गला दबायेंगे या गोली मारेंगे … ? कितनी फिरौती मांगी होगी? वो बेचारा नाउम्मीद होकर जीने की आस खो चुका था .. अपने आप ही अनायास ही सुबकने लगा।
सुकेश अभी सोया नहीं था। उसके सुबकने की आवाज़ उसके कानो में पड़ी तो वो चौंक गया।
“अरे … भैय्या तुम ठीक तो हो .. क्या हुआ?”
रुधे हुए गले से मयंक ने जवाब दिया “कुछ नहीं, ठीक हूँ।” सुकेश अब पक्का जान गया की मयंक रो रहा था।
उसने झट से लालटेन जलाई। मयंक के चेहरे पर तकलीफ और डर था।
“अरे .. मयंक .. ” अब वो घबरा गया था “रो मत .. क्या हुआ .. तुम्हे जल्दी ही छोड़ आएंगे .. दुखी मत हो। बस कुछ दिन के लिए हमारे मेहमान बन कर रहो …”
“तुम लोग मुझे मार डालोगे?” अब उसने हिम्मत जुटा कर सुकेश से नज़रे मिलते हुए पूछा।
सुकेश सकपका गया। वो मयंक से नज़रें नहीं मिला पा रहा था।
” अरे … अरे .. पागल हो गए हो क्या? तुम्हे क्यूँ मारने लगे भला? कौन मारेगा तुमको ? कैसी बातें कर रहे हो? तुमसे पहले मैं अपनी जान दे दूंगा …”
“कितने पैसे मांगे हैं मेरे पापा से? अगर न दे पाए तो?” मयंक ने फिर सवाल किया।
सुकेश ने हार मान ली। “देखो भैय्या … हम बहुत छोटे और गरीब लोग हैं। ये सब काम हमारे नहीं। खेती करते हैं और जो कुछ मिलता है उसी में खुश रहते है। ये सब काम बड़े लोगों के हैं। हमें तो तुम्हे रखने के लिए कहा गया था। इस सब की पीछे कौन है, हमें खुद नहीं मालूम। बहुत ऊपर से हमें तुम्हारे बारे में खबर आई थी। जिसने हमें खबर पहुंचाई थी, उसे भी नहीं मालूम की वास्तव में ये सब कौन कर रहा है। लेकिन यकीन करो मयंक भैय्या, हम सिर्फ तुम्हारा ख्याल रखने के लिए हैं। तुम्हे यहाँ कोइ कुछ नहीं करेगा।”
“लेकिन अगर तुम्हे पैसे नहीं मिले तो? मैंने रेडिओ पर सुना था की नक्सलियों की रिहाई की मांग करी है। अगर उन्हें नहीं छोड़ा तो?”
” तुम क्यूँ परेशान होते हो? नहीं छोड़ा तो नहीं छोड़ा, लेकिन हम तुम्हारा बाल भी बांका नहीं होने देंगे … चलो अब सो जाओ, और बातें मत सोचो।”
सुकेश ने फिर लालटेन बुझा दी और मयंक के सर पर हाथ फेरने लगा।
उसकी बातों से मयंक को तसल्ली मिली। लेकिन अभी भी उसका डर पूरी तरह से गया नहीं था।
सुकेश उसके सर पर हाथ फेरने लगा। थोड़ी देर बाद दोनों सो गए। सुबह जब मयंक की नींद टूटी तो वो उस झोंपड़े में अकेला था। बाहर उठा कर देखा तो सुकेश उस नाली के किनारे बैठा दातून कर रहा था।
“अरे मयंक … गुड मार्निंग . ये दातून ले लो। ”
मयंक दातून लेकर सुकेश के बगल उकड़ूं बैठा दांत घिसने लगा।
“तुम हलके हो जाओ … वो सामने लोटा रक्खा है, फिर नहा लेना। उसके बाद तुम्हे भोजन करने ले चलेंगे।” सुकेश उठ कर तौलिया ले आया और नहाने की तैय्यारी करने लगा। मयंक बगल के झुरमुट में शौच के लिए चला गया। जब आया तब तक सुकेश नहा चुका था। मयंक भी फटाफट नहा लिया और सुकेश के साथ भोजन के लिए चल दिया।

दोनों बाग़-बगीचों और खेतों से होते हुए फिर से उसी घर में पहुँच गए जहाँ पिछली रात खाना खाया था।
“आइये मयंक भैय्या … बैठिये।”
उस ग्रामीण परिवार ने फिर से मयंक का स्वागत किया। दोनों ने करमकल्ले की सब्जी और पराठा खाया और वापस आ गए।
वापस आकर दोनों उसी झोंपड़े में बैठ गए। मयंक ने फिर से सर लटका लिया। ऐसे में हर किसी का सर लटका रहेगा।
सुकेश उसके बगल बैठ गया और उसके कंधे पर अपनी बांह रख दी।
“मयंक … जो छोटा मत करो, तुम्हे जल्दी वापस छोड़ आएंगे।”
“लेकिन कब?” सुकेश के दिलासे का उसपर कोइ असर नहीं हो रहा था।
“अरे मेरी जान … तुम क्यूँ चिंता करते हो … सुकेश ने उसे अपनी बाँहों में भर लिया।
मयंक से नहीं रहा गया और वो रोने लगा।
सुकेश मयंक को उसी तरह अपनी बाँहों में भरे बैठा रहा और उसके सर पर हलके हलके थपकी मारता रहा।
“अरे मेरी जान … रो मत।”
मयंक कुछ पल यूँ ही सुबकता रहा। न जाने कब वो अपना सर सुकेश के कंधे पर रख चुका था।
सुकेश अब धीरे धीरे उसके बाल सहला रहा था और उसका रोना बंद होने का इंतज़ार कर रहा था।
मयंक ने अपने आपको संभाला और सीधे बैठ गया। सुकेश उसके लिए पीने का पानी ले आया।
उसने अपने चेहरे पर पानी के छपाके मारे और दो घूँट भरी।
सुकेश ने फिर उसके कन्धों पर अपनी बांह डाल दी। बहुत तरस आ रहा था उसे मयंक पर। उसे खुद नहीं मालूम था की मयंक के साथ क्या होने वाला है। उसे तो बस उसके भाई ने उसका ख्याल रखने के लिए कहा था। खुद उसके भाई को भी नहीं मालूम था मयंक को कैसे, कहाँ से लाया गया है और उसका अंजाम क्या होगा। उसके भाई को भी किसी और के ज़रिये मयंक की खबर मिली थी।
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मयंक को सुकेश के गाँव से 15 किलोमीटर दूर, आधी रात में एक ट्रेक्टर से, राष्ट्रीय राजमार्ग से जुड़ी एक कच्ची सड़क पर बेहोशी की हालत में उतारा गया था। फिर उसे बैलगाड़ी में लाद कर उसके गाँव तक लाया गया था।

वो पूरे दिन मयंक के साथ लगा रहा। वो उसे अपने साथ गाँव घुमाने ले गया, नहर तालाब और पोखर दिखाए।
दोनों में हंसी मजाक भी हुआ। इस सब से मयंक का मन थोड़ा सा हल्का हुआ, सुकेश ने उसे उम्मीद भी बंधा दी।
टहलते -टहलते दोनों लौट कर आये तो देखा किसी ने उनकी झोंपड़ी में एक पोटली छोड़ी हुई थी। देखा तो उसमे दोनों का भोजन रखा हुआ था, साथ में केले के पत्ते भी थे। कोइ शायद उन्हें खाना पहुंचा गया था।

दोनों ने खाना खाया और लेट गए। कुछ देर बाद जब मयंक की नींद खुली तो सुकेश गायब था। बेचारा घबरा गया … कहीं सुकेश उसे अकेला छोड़ कर चला गया हो? अभी शायद नक्सली आते हों उसे गोली मारने? उसके मन में फिर से बुरे ख़याल आने लगे। थोड़ी देर वो यूँ ही बैठा रहा, फिर जी हल्का करने के लिए बहार टहलने चला गया। अब शाम होने को आई थी। शाम होते होते फिर गोधुली हो गयी और फिर अँधेरा।

मयंक को लगा शायद सुकेश किसी काम से गया होगा। अगर उसे मारना होता तो अभी मार दिया गया होता। तभी उसे सुकेश की आवाज़ सुनाई दी :

अगले भाग जल्द ही पोस्ट किया जाएगा …………

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